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फेसबुक पर राजीव कटारा ने अपने प्रिय मित्र दीपक सिन्हा को यों याद किया था

दीपक सिन्हा आज दीपक को गए 17 साल हो गए। वह मेरे लिए क्या था? क्या कहूं? बस इतना ही कि उसके जाने के बाद मेरी जिंदगी ठीक वही नहीं रह गई। कितना कुछ उसके साथ ही चला गया। कभी यों ही किसीके पास जा सकते हैं? लगता है यह अधिकार किसीने छीन लिया। कभी-कभी महसूस होता है कि उसके जाने से एक किस्म की अनौपचारिक दुनिया ही खत्म हो गई। आज भी मेरे यहां कुछ किताबें हैं, जो दीपक के लिए ही खरीदी गई थीं। उसकी तबीयत बिगड़ती चली गई और वे शेल्फ में ही रह गईं। उन किताबों को किसीको देने का मन भी नहीं होता। अक्सर हम दो किताबें खरीदते थे। एक दूसरे के लिए ये किताबें होती थीं। कब हुई थी उससे पहली मुलाकात? यह 1981 की बात है। वह जमशेदपुर से दिल्ली आया था। दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए. करने। उसी दौरान किसी क्लास के बाद हम मिले थे। वह शायद पहली-दूसरी क्लास ही रही होगी। हम कब गहरे दोस्त हो गए? पता ही नहीं चला। फिर कब वह मेरे परिवार का हिस्सा हो गया। यह भी पता नहीं चला। दीपक से जब मुलाकात हुई थी, तो मैं बेहद अकेला था। एक दौर के बाद स्कूली दोस्तों से नाता टूट गया था। कॉलेज में कोई नया दोस्त नहीं जुड़ा था। या उन्हे...
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भारतीय साहित्य मानव जाति की प्राचीन ज्ञान परंपरा का दर्पण है : प्रो. अवधेश प्रधान

    By   कैलाश लिंबा  - September 17, 2021 0 616 नई दिल्ली।  ‘भारतीय साहित्य की अवधारणा भारत से जुड़ी है । भारत एक बहुनस्लीय, बहुधर्मी तथा बहुभाषी देश है । भारतीय साहित्य के संबंध सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन, तिब्बत तथा दक्षिणी एशिया से भी जुड़े हैं ।’ उक्त विचार हिंदी के सुपरिचित आलोचक एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य प्रो. अवधेश प्रधान ने हिंदी साहित्य सभा, हिंदी विभाग, हिंदू कॉलेज द्वारा ‘डॉ. दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान’ के अंतर्गत आयोजित ऑनलाइन व्याख्यान में ‘भारतीय साहित्य की अवधारणा’ विषय पर व्यक्त किए। हिंदी विभाग की इस प्रतिष्ठित वार्षिक व्याख्यान शृंखला में प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि भारतीय साहित्य का इतिहास आज से करीब पांच हज़ार वर्ष पुराना है । भारतीय साहित्य की जड़ें संस्कृत तथा अन्य आर्य भाषा परिवार से जुड़ी हैं । अगर प्राचीन भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया जाए तो मालूम होता है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में न सिर्फ रस साहित्य शामिल है, बल्कि उसमें ज्ञानात्मक साहित्य भी सम्मिलित है । उन्होंने ...

आचार्य शुक्ल का अवदान महनीय : व्योमेश शुक्ल

 दिल्ली : हिंदू कालेज में दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान नई दिल्ली (रजनीश के झा)। सरस्वती पत्रिका और महावीर प्रसाद द्विवेदी का दाय बहुत बड़ा है जिसे रामचंद्र शुक्ल के लेखन के मूल और आचार्य द्विवेदी द्वारा उसके संपादित स्वरूप की तुलना करने पर सहज ही समझ आता है। ऐसे मनीषियों के अवदान को नयी पीढ़ी देखे, समझे और उसे आगे बढ़ाए यह नागरी प्रचारिणी सभा का उद्देश्य है। सभा के प्रधानमंत्री और युवा लेखक व्योमेश शुक्ल ने हिंदू कालेज में एक व्याख्यान में कहा कि हिंदू कालेज की हिंदी साहित्य सभा और नागरी प्रचारिणी सभा में केवल नाम साम्य ही नहीं है बल्कि दोनों के मूल में युवा अध्येताओं का संकल्प और समर्पण है। शुक्ल ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल की साहित्यिक अवधारणाओं की चर्चा करते हुए उनके लेखन चिंतन के विभिन्न पहलुओं को श्रोताओं के सामने रखा। शुक्ल ने कहा कि आचार्य ने कविता को मनुष्यता की संरक्षिका बताते हुए उसे मनुष्य के भावों की रक्षा करने वाली शक्ति बताया है। उन्होंने द्विवेदी जी और रामचंद्र शुक्ल के पत्राचार की कुछ पंक्तियों को भी उद्धृत किया। उन्होंने कहा कि  आचार्य शुक्ल के  निबंध संग्रह...

'भक्तिकाल के कवियों का मुख्य अलंकार सहजयोक्ति है'

  हिंदू कालेज में दीपक सिंहा स्मृति व्याख्यान 'मौलिकता सदैव अपनी भाषा में विकसित होती है' स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम Saturday 4 October 2014 03:43:59 AM हिंदू कालेज में दीपक सिंहा स्मृति व्याख्यान स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम  Saturday 4 October 2014 03:43:59 AM नई दिल्ली।  कुछ विद्वान पूरा का पूरा भक्ति काव्य आधुनिकता के सांचे में बदल देना चाहते हैं, जबकि भक्ति काव्य की विशेषता यह है कि उसमे आधुनिक भाव बोध से मेल वाली बहुत सारी बातें हैं पर सारा का सारा भक्ति काल आधुनिक नहीं हो सकता, किसी भी रूप में नहीं। सुपरिचित आलोचक डॉ जीवन सिंह ने हिंदू कालेज में भक्ति कविता की प्रासंगिकता विषय पर दीपक सिंहा स्मृति व्याख्यान माला में कहा कि भक्तिकाल की विशेषता संगीत, कला और स्थापत्य को भी मज़बूत विरासत देने में है, वह केवल भजन कीर्तन नहीं है, उसने इन कलाओं-स्थापत्यों को पुनः संस्कारित किया और इसी काल में शास्त्रीय संगीत श्रेष्ठ ध्रुपद को नई ऊंचाई मिली। डॉ जीवन सिंह  ने कहा कि भक्ति काव्य में जो अनुराग है, वह मनुष्य और मानव समाज के प्रति है, ईश्वर के प्रति अनुराग भाव की भूमिका अपेक्षाकृत क...

हिंदू कॉलेज में 'दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान'

  Varta Sambhav-Dhanbad   · दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में आज दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया, जहाँ वक्ताओं ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साहित्यिक योगदान और प्रो. दीपक सिन्हा के शिक्षक व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। आचार्य शुक्ल और लोकमंगल की भावना पर चर्चा नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री और युवा लेखक व्योमेश शुक्ल मुख्य वक्ता रहे। उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साहित्यिक अवदान को 'महनीय' बताया: * सरस्वती और द्विवेदी जी का योगदान: व्योमेश शुक्ल ने कहा कि सरस्वती पत्रिका और महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान बहुत बड़ा है, जिसे रामचंद्र शुक्ल के लेखन और द्विवेदी जी द्वारा उसके संपादित स्वरूप की तुलना करने पर समझा जा सकता है। * लोकमंगल की भावना: उन्होंने कहा कि आचार्य शुक्ल के निबंध संग्रह 'चिंतामणि' के पंद्रह निबंधों में से दस का शीर्षक 'मनुष्य' है, जो कहीं न कहीं उनकी लोकमंगल की भावना को उजागर करता है। * कविता की अवधारणा: शुक्ल ने आचार्य शुक्ल की साहित्यिक अवधारणाओं की चर्चा करते हुए कहा कि आचार्य ने कविता को मनुष्यता की संरक्षिका बताते हु...

सिनेमा की भाषा सबसे असरकारक होती है: संजय जोशी

    November 03, 2023, 12:46 IST दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज में 'दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान' का आयोजन किया गया. व्याख्यान में प्रसिद्ध सिनेकार संजय जोशी ने सिनेमा की भाषा और बोली पर विस्तृत चर्चा की.   हिन्दू कॉलेज में 'दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान' में विचार व्यक्त करते हुए संजय जोशी. सिनेमा की भाषा दृश्यों और ध्वनियों से बनती है. यह वह भाषा है जो दुनिया की किसी भी बोली जाने वाली भाषा से अधिक प्रभावी और मर्मस्पर्शी है. प्रसिद्ध सिनेकार संजय जोशी ने ये बातें हिन्दू कॉलेज में आयोजित ‘दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान’ में कहीं. हिंदी साहित्य सभा द्वारा आयोजित इस व्याख्यान में संजय जोशी ने कनाडा के फिल्मकार नॉर्मन एन लॉरेन की शॉर्ट फिल्म ‘ए चेरी टेल’ का प्रदर्शन तथा व्याख्या में सिनेमा की भाषा और बोली जाने वाली भाषा का अंतर स्पष्ट किया. इस फिल्म में पंडित रविशंकर का सितार ही फिल्म की भाषा का निर्माण करता है. व्याख्यान में लॉरेन की दूसरी फिल्म ‘नेबर’ का भी प्रदर्शन किया. भारत की प्रसिद्ध निर्देशक गीतांजलि राव की लघु फिल्म ‘प्रिंटेड रेनबो’ का प्रदर्शन कर संजय जोशी ने बत...

भारतीय साहित्य के तार दूर तक फैले हैं : प्रो. अवधेश प्रधान

  9/16/2021 02:08:00 pm हिंदू कॉलेज में डॉ. दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान का आयोजन नई दिल्ली। भारत को देखने समझने के कई ढंग हैं जिनमें एक रास्ता साहित्य का भी है। इस भारतीय साहित्य की अवधारणा भारत से जुड़ी है । भारत एक बहुनस्लीय, बहुधर्मी तथा बहुभाषी देश है। भारतीय साहित्य के संबंध सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन, तिब्बत तथा दक्षिणी एशिया से भी जुड़े हैं। उक्त विचार हिंदी के सुपरिचित आलोचक एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य प्रो. अवधेश प्रधान ने 15 सितंबर को हिंदी साहित्य सभा, हिंदी विभाग, हिंदू कॉलेज द्वारा ‘डॉ. दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान - 2021' के अंतर्गत आयोजित ऑनलाइन व्याख्यान में ‘ भारतीय साहित्य की अवधारणा ’ विषय पर व्यक्त किए ।  पांच हज़ार वर्ष पुराना है भारतीय साहित्य हिंदी विभाग की इस प्रतिष्ठित वार्षिक व्याख्यान शृंखला में प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि भारतीय साहित्य का इतिहास आज से करीब पांच हज़ार वर्ष पुराना है । भारतीय साहित्य की जड़ें संस्कृत तथा अन्य आर्य भाषा परिवार से जुड़ी हैं । अगर प्राचीन भारतीय भाषाओं का...