दीपक सिन्हा आज दीपक को गए 17 साल हो गए। वह मेरे लिए क्या था? क्या कहूं? बस इतना ही कि उसके जाने के बाद मेरी जिंदगी ठीक वही नहीं रह गई। कितना कुछ उसके साथ ही चला गया। कभी यों ही किसीके पास जा सकते हैं? लगता है यह अधिकार किसीने छीन लिया। कभी-कभी महसूस होता है कि उसके जाने से एक किस्म की अनौपचारिक दुनिया ही खत्म हो गई। आज भी मेरे यहां कुछ किताबें हैं, जो दीपक के लिए ही खरीदी गई थीं। उसकी तबीयत बिगड़ती चली गई और वे शेल्फ में ही रह गईं। उन किताबों को किसीको देने का मन भी नहीं होता। अक्सर हम दो किताबें खरीदते थे। एक दूसरे के लिए ये किताबें होती थीं। कब हुई थी उससे पहली मुलाकात? यह 1981 की बात है। वह जमशेदपुर से दिल्ली आया था। दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए. करने। उसी दौरान किसी क्लास के बाद हम मिले थे। वह शायद पहली-दूसरी क्लास ही रही होगी। हम कब गहरे दोस्त हो गए? पता ही नहीं चला। फिर कब वह मेरे परिवार का हिस्सा हो गया। यह भी पता नहीं चला। दीपक से जब मुलाकात हुई थी, तो मैं बेहद अकेला था। एक दौर के बाद स्कूली दोस्तों से नाता टूट गया था। कॉलेज में कोई नया दोस्त नहीं जुड़ा था। या उन्हे...